मैदान की धूप और तय समय · 4 मिनट 30 सेकंड
लाल गेंद और छह ओवर

मैदान पर मोहल्ले की इकलौती लाल गेंद थी, और उसी पर पूरे शनिवार का दारोमदार। पहली ही गेंद पर वह बीच से फट गई। किसी को नहीं पता था कि उसके अंदर एक साल से क्या छुपा बैठा है।
लाल गेंद और छह ओवर
गत्ते पर छह ओवर, बंटी की ज़िद
शनिवार की दुपहरी थी, और मैदान की सूखी ज़मीन से गर्म धूल उड़ रही थी। बिट्टू ने चायपत्ती के ख़ाली गत्ते पर पेंसिल से लिखा: छह ओवर। फिर गत्ता ईंट से स्कूल की दीवार पर टिका दिया।
नियम साफ़ था। पैंतीस मिनट बाद स्कूल की घंटी बजेगी, गेट खुलेगा, और साइकिलों का रेला इसी मैदान से होकर निकलेगा। तब तक पिच खाली होनी चाहिए।
तभी बंटी आया। मोहल्ले का सबसे लंबा लड़का, कंधे पर मोहल्ले का इकलौता बल्ला, जिसकी ग्रिप पर तीन जगह लाल टेप लिपटा था। गत्ता पढ़ते ही उसकी भौंहें चढ़ गईं।
"छह ओवर? दस से कम नहीं! ये छोटे दो गेंद में आउट होंगे, मेरी बारी आने से पहले धूप ढल जाएगी। दस ओवर नहीं, तो बल्ला मेरा, मैं घर चला।"
बिट्टू ने चप्पल सीधी की। "ले जाओ बल्ला। चप्पल से खेल लेंगे। पर गेंद हेडमास्टर साहब के अहाते में गई, तो उनके कुत्ते के सामने से तुम ही निकालोगे।" बंटी बुदबुदाता हुआ दीवार पर बैठ गया।
बिट्टू ने ट्रायल गेंद फेंकी। गेंद कंक्रीट के किनारे से टकराई, और एक ऐसी आवाज़ आई जो उस मैदान ने पहले नहीं सुनी थी। पुरानी सीवन बीच से खुल गई थी। मोहल्ले में खेलने लायक यही एक गेंद थी।
गेट की जंजीर, पच्चीस मिनट
फटी गेंद मुट्ठी में दबाए बिट्टू स्कूल के गेट की तरफ़ भागी। लता दीदी वहाँ होंगी। वे बंटी को डाँट देंगी, या दफ़्तर से कोई पुरानी गेंद निकाल देंगी।
लता दीदी गेट पर ही थीं, हाथ में रजिस्टर, साइकिल स्टैंड के पास रास्ता खाली करवाती हुईं। बिट्टू हाँफते हुए बोली, "दीदी, बंटी बल्ला दबाए बैठा है, और गेंद भी फट गई। ज़रा उसे समझाइए न!"
लता दीदी ने चश्मा नाक पर टिकाया। चेहरे पर वही मुस्कान आई जो इम्तिहान के दिनों में होती थी। "मैच तुम्हारा, नियम भी तुम्हारे। बंटी को तुम ही समझाओ।"
"और सुनो। पेरेंट्स मीटिंग जल्दी ख़त्म हो गई है। पैंतीस मिनट भूल जाओ। पच्चीस मिनट में घंटी बजेगी। साइकिल लेन में एक भी ईंट या बच्चा मिला, तो बल्ला-गेंद दोनों स्टोर में।"
बिट्टू वहीं खड़ी रह गई। मदद नहीं मिली, उल्टा दस मिनट और छिन गए। और हाथ में गेंद अब भी दो फाँक थी।
चाचा का सुआ, खोई हुई सीटी
बिट्टू सीधी सैलून पहुँची। इक़बाल चाचा चबूतरे पर बैठे उस्तरे की पट्टी साफ़ कर रहे थे। उसने फटी गेंद उनकी हथेली पर रख दी। "चाचा, दो टाँके! पच्चीस मिनट में गेट खुल जाएगा।"
चाचा ने गेंद उँगलियों में घुमाई, फिर अलमारी से मोची वाला सुआ और मोम लगा काला धागा निकाला। "सिल दूँगा, बिटिया। पर यह गेंद कुछ ज़्यादा भारी लग रही है।"
सुआ चमड़े में उतरा, और रुक गया। अंदर कुछ सख़्त था। चाचा ने चिमटी डाली और धीरे से खींचा। एक छोटी, हरी, प्लास्टिक की चीज़।
एक सीटी। पीटीआई मास्टर साहब की वही सीटी जो पिछले साल गुम हुई थी, और जिसकी चोरी का इल्ज़ाम पूरे मोहल्ले ने मोनू पर लगाया था। पिछली बरसात में सीवन ज़रा उधड़ी थी; सीटी उसी दरार में जा धँसी होगी, और साल भर गेंद उसे लिए घूमती रही।
बिट्टू ने सीटी मुट्ठी में बंद कर ली। मोनू आज भी मैदान पर था, विकेट के पीछे, और आज भी उससे कोई ठीक से बात नहीं करता था।
चाचा ने चार मोटे टाँके जड़े और एक तरफ़ धागे का उभार छोड़ दिया। फिर आँख दबाई। "गेंद सिल गई। पर अब यह सीधी नहीं जाएगी, हवा में मुड़ेगी। किसी होशियार गेंदबाज़ को देना।"
केले जैसी स्विंग, आख़िरी गेंद
मैदान पर लौटकर बिट्टू ने गत्ते पर सबसे ऊपर बंटी का नाम लिखा और गेंद उसके हाथ में रख दी। "पहला ओवर तुम्हारा।" बंटी ने सिली हुई गेंद तौली, और उसकी पुरानी अकड़ लौट आई। "तीन गेंद, तीन विकेट। देखते रहना।"
पहली गेंद हवा में निकली और चाचा के टाँके पर ऐसे मुड़ी जैसे केला हो। बल्लेबाज़ ने हवा काटी, स्टंप उड़ गए। मैदान तालियों से गूँज उठा, और सबसे ज़्यादा हैरान बंटी ख़ुद था।
अब उसे शेखी की फ़ुर्सत नहीं थी। पूरे ओवर वह उस अजीब गेंद को काबू करने में पसीने-पसीने होता रहा।
छठा ओवर। आख़िरी गेंद, जीत के लिए दो रन। स्कूल के गेट पर लता दीदी जंजीर पर हाथ रखे खड़ी थीं। स्ट्राइक पर आठ साल का चिंटू, जिसे बंटी पानी पिलाने लायक भी नहीं समझता था।
बंटी ने अपनी सबसे तेज़ गेंद फेंकी। गेंद टाँके पर घूमी, चिंटू ने आँखें मूँदकर बल्ला अड़ाया, और गेंद किनारा लेकर सीधे साइकिल स्टैंड की दीवार से जा टकराई। चौका।
ठीक उसी पल घंटी बजी। टन-टन। बिट्टू ने जेब से हरी सीटी निकाली, विकेट के पीछे खड़े मोनू की तरफ़ देखा, और ज़ोर से फूँकी। मैच ख़त्म।
पूरा मैदान उस सीटी की आवाज़ पहचानता था। मोनू ने भी पहचानी। वह कुछ बोला नहीं, बस साल भर में पहली बार खुलकर हँसा।
जो बदला

